मध्य प्रदेश के आगामी चुनाव और दिग्विजय सिंह पर संघ के हमले के राजनीतिक मायने

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यदि हम इतिहास के पन्नों को सरसरी निगाह से भी खंगालेंगे तो पाएंगे की रूढ़िवादी राजनीति करना सुधारवादी राजनीति को ज़मीन पर उतारने से हमेशा ज़्यादा आसान रहा है। वह इसलिए क्योंकि समाज में रूढीवादी राजनीति की ज़मीन पहले से ही तैयार होती है जबकि समाज के स्थापित सत्य और धारणाओं के विरुद्ध जाते हुए चुनावी बहुमत जुटाना एक बड़ा कठिन काम होता है। जब-जब समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है तब-तब सुधारवादी राजनीतिक धारा के साथ खड़े लोगों पर सबसे ज़्यादा हमला होता है। आज के भारत का राजनीतिक मंज़र भी कुछ ऐसा ही है और रूढ़िवाद के विरोधियों को इसकी कीमत चुकानी पद रही है।

एलीट धर्मनिरपेक्षता बनाम ज़मीनी हिंदुत्व 

आज धुर्वीकरण अपने चरम पर है और अल्पसंख्यकों के खिलाफ ज़हर उगलना या उनके विषय में मौन हो जाने में ही चुनावी समझदारी मानी जाती है। धर्मनिरपेक्षता का भार कोई क्यों उठाए जब उसके बिना सत्ता पाना आसान है? लेकिन अशफ़ाक़ुल्लाह खान और महात्मा गाँधी का भारत यहां पहुंचा कैसे? आज का भारत ऐसा इसलिए है क्योंकि आज़ादी के बाद जहां धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत दिल्ली और अन्य राजधानियों के “एलीट सर्किल” तक सीमित रह गया वहीं इस दौरान हिंदुत्व का प्रसार सुदूर गाँवों तक किया गया। तो जंतर मंतर पर “नॉट इन माए नेम” के खूब नारे लगे लेकिन इनकी गूँज मध्य प्रदेश के जावरा तक नहीं पहुंची। 

हिंदुत्ववादी ताक़तों ने इन उदारवादी शक्तियों को जनता के समक्ष एलीट साबित कर दिया है। यह करने में वह मूलतः दो कारणों से सफल रहे – पहला, क्योंकि इस धड़े के प्रमुख नुमाइंदों के पास अपना खुद का कोई जनाधार नहीं था और दूसरा, क्योंकि इन्होने भारत जैसे धार्मिक देश में धर्म को पूर्णतः अस्वीकार किया और नतीजतन वे खुद-ब-खुद समाज की मुख्यधारा से अलग जाकर खड़े हो गए।

गाँधी का दर्शन: धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता की सीख

शायद इस ही वजह से हिन्दुत्ववादियों के लिए वामपंथियों को खारिज करना आसान रहा लेकिन गाँधी का मुक़ाबला वे नहीं कर पाए। गाँधी ने हिन्दू धर्म और समाज को कभी अस्वीकार नहीं किया लेकिन उसमें सुधार के लिए और कट्टरता के विरुद्ध प्रयत्न भी आजीवन जारी रखे। सबसे बड़ी बात – गाँधी ने अपनी सनातनी आस्था को कभी इस्लाम के विरोध में परिभाषित नहीं किया। उनके लिए सनातनी हिन्दू होने का अर्थ राम से प्यार था लेकिन मुसलामानों से नफरत नहीं। यह वैचारिक बहस हिंदुत्ववादी आज तक नहीं जीत पाए हैं और इसलिए उन्होंने गाँधी के विचारों को छोड़ उनके प्रतीकों को अपनाने के प्रयास शुरू किये हैं जिससे नये अंतर्विरोध उत्पन्न होना तय हैं। 

हिंदुत्ववादी ताक़तें एक विचारधारा पर संगठित होकर चलती हैं। और इसलिए वे सबसे कट्टर विरोध भी उन्हीं का करती हैं जो उनसे वैचारिक लोहा लेने का साहस दिखाए। ज़्यादातर नेता चुनावी गणित के कारण यह हिम्मत नहीं जुटा पाते। लेकिन जो जुटाते हैं उनपर पलटवार भी ज़ोरदार होता है और यह स्वाभाविक भी है।

शायद इसलिए दिग्विजय सिंह पर भी विपक्ष का हमला सबसे तेज़ रहता है। वे गांधीवादी धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खरे उतरते हैं –  उन्होंने भी सनातनी परम्पाराओं को अस्वीकार नहीं किया लेकिन कभी उसके बहाने अल्पसंख्यकों पर निशाना भी नहीं साधा। उनके पास व्यापक जनाधार भी है और राज्य सभा के दिग्विजय को राघोगढ़ के “दिग्गी राजा” में बदलते देर भी नहीं लगती इसलिए इन पर “एलीट” का ठप्पा भी नहीं लगता। अपनी नर्मदा यात्रा से दिग्विजय ने हिन्दू होने और हिंदुत्ववादी होने में फ़र्क़ साफ़ कर दिया। वहीं इसके जवाब में कंप्यूटर बाबा आदि को मंत्री का दर्जा देकर सरकार को कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा। 

इन चुनावों में क्यों नहीं हो रही विकास पर बहस?

हमें इस परिपेक्ष्य में बीते दिनों का राजनीतिक घटनाक्रम देखना होगा। 18 जून को खबर आयी की भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यकर्ताओं से कहा है की कमल नाथ को छोड़ें और दिग्गी पर निशाना साधें। उसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और ओएनजीसी के डायरेक्टर संबित पात्रा ने प्रेस वार्ता में उन पर “हिन्दू आतंकवाद” शब्द के प्रयोग का आरोप लगाया। उसके बाद स्वयं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह आरोप दोहराया। और प्रदेश भर में चल रही समन्वय समिति की हर छोटी – बड़ी प्रेस वार्ता में दिग्गी राजा के लगातार खंडन के बावजूद यह सवाल उठाया जा रहा है। दिग्विजय सिंह के सोशल मीडिया पर उपलब्ध भाषणों में कहीं भी हिन्दू आतंकवाद शब्द नहीं मिलता जबकि हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिकता के विरोध की बात साफ़-साफ़ सामने आती है। इसी दौरान ऑल्ट न्यूज़ द्वारा दिग्विजय सिंह के नाम पर बनाए फेक वायरल पोस्ट भी सामने आये। ये नैरेटिव क्यों और कौन बना रहा है?

देश भर में किये जा रहे सर्वे इसी ओर इशारा कर रहे हैं की सारे भाजपा शासित राज्यों में पार्टी की सबसे बुरी हालत मध्य प्रदेश में है। इसकी मुख्य वजह ग्रामीण क्षेत्रों में और किसानों के बीच भारी आक्रोश बताई जा रही है। क्या शिवराज सरकार को इस चुनाव में अपने पिछले 15 साल का हिसाब नहीं देना चाहिए? लेकिन भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस के रिकॉर्ड से तुलना की बहस नहीं छेड़ना चाहते क्योंकि लोकल स्तर पर शिवराज सरकार की छवि धूमिल हुई है। 

यदि तुलना करें तो दिग्विजय सिंह के पूरे शासन काल में उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा जबकि इस सरकार पर व्यापम का साया मंडरा रहा है। सन 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद बिजली की किल्लत तो हुई लेकिन उस दौरान प्राथमिकता शहरों को नहीं बल्कि किसानों को दी गयी। दिग्विजय सरकार को इस फैसले का भारी खामियाज़ा भी उठाना पड़ा। पंचायती राज से सत्ता का विकेन्द्रीकरण हुआ और फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा गया जबकि अभी भावान्तर के क्रियान्वन को लेकर आम किसान में भारी असंतोष है। उस दौरान सामाजिक क्षेत्र में जहां दलित एजेंडा लाया गया वहीं आज एससी – एसटी अत्याचार विरोधी क़ानून को कमज़ोर करने की बात दलित – आदिवासी वर्गों में आकुलता की वजह बनी हुई है। इसके ऊपर राहुल गाँधी ने मंदसौर में एलान कर दिया है की सरकार बनने के 10 दिन के भीतर किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा। 

शायद इसी वजह से बहस मुद्दों से हटाकर हस्तियों पर और तथ्यों से हटाकर आरोप – प्रत्यारोप पर केंद्रित की जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हमेशा राजनीति को विकास की प्रतिस्पर्धा के रूप में लेने का आव्हान करते आएं हैं। मध्य प्रदेश बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है – राज्य की वित्तीय हालत बहुत खराब है। प्रदेश के हित में यही होगा की आगामी चुनाव में बहस विकास के मॉडल और गरीब किसान के जीवन को बेहतर बनाने पर केंद्रित रहे ना कि तथ्यहीन दावों पर।

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