केजरीवाल के बचाव में: अरविंद ज़्यादा “विश्वास” योग्य

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Source: NDTV

कुमार विश्वास के बाहर निकाले जाने के बाद सोशल मीडिया और टीवी पर बहुत हल्ला मचा हुआ है. बहुत से बाहर निकले लोग केजरीवाल को डिक्टेटर कह रहे हैं. और विश्वास खुद को शहीद बता रहे हैं. उन पर बिकाऊ होने का आरोप लगाया जा रहा है. कुमार विश्वास ने म्यूनिसिपल चुनाव के वक़्त भाजपा के साथ मिलकर आम आदमी पार्टी में सत्तापलट करने की कोशिश की थी। ये बात सब जानकारों को पता है। गत 3 वर्षों में जितनी उठा पटक इस पार्टी में हुई है और किसी में नहीं हुई है. ये एक विचारधाराविहीन पार्टी होने और बहुत कम समय में बहुत महत्वकांक्षी पार्टी होने का नतीजा है.

विश्वास कोई एक्टिविस्ट नहीं हैं। उनके लिए राजनीति अपने प्रचार का एक ज़रिया है। उनकी लोकप्रियता एक समय में आप के काम की थी। उनमें भाषण कौशल है। वे इसका इस्तेमाल पार्टी के लिए करते थे। और बदले में पार्टी उनको अपना व्यक्तित्व चमकाने का मंच देती थी। वे आज भाजपा-कांग्रेस कहीं भी जाकर प्रवक्ता की भूमिका अदा कर सकते हैं। लेकिन केजरीवाल की हस्ती इस पार्टी से बनेगी या बिगड़ेगी। उन्हें इसको ज़िंदा रखने और बढ़ाने की ज़रूरत है। वे एक्टिविस्ट हैं। यदि आम आदमी पार्टी ख़त्म हो गयी तो वे भी नहीं रहेंगे.

कुमार विश्वास को ऐसी कोई दिक्कत नहीं है. कुछ समय पहले जब योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी से निकाला गया था तब अरविन्द केजरीवाल का कुछ ऐसे ही आरोपों से कुमार विश्वास ने बचाव किया था. आज जब उनको राज्य सभा नहीं भेजा गया तो एक दम से वही आरोप सही हो गए?

ये वीडियो देखें:

अरविन्द केजरीवाल समझ चुके हैं की ईमानदारी से आम भारतीय को कोई लेना देना नहीं हैं। इसकी राजनीतिक उपयोगिता केवल प्रतीकात्मक है. मध्यम वर्ग कुछ आत्मग्लानि में और कुछ दोगलेपन में इसका चोगा ओढ़े रहता है। यदि उसे मतलब होता तो अब तक नरेंद्र मोदी सरकार के भ्रष्टाचार से लड़ने की वादाखिलाफी पर सडकों पर उतरकर ईंट से ईंट बजा देता. मुकुल रॉय से लेकर व्यापम तक मध्यम वर्ग को मालूम है की क्या हो रहा है लेकिन वो चुप है. उसकी पार्टी भाजपा/कांग्रेस/आप कोई भी हो सकती है। उसको कुछ खास फ़र्क़ नहीं पड़ता सत्ता परिवर्तन से। उसके लिए राजनीति एक शगल है; उसकी ज़रुरत नहीं.

विपक्ष आदर्शवाद और भ्रष्टाचार के नारों से नहीं बल्कि ग़रीबों की असल दिक़्क़तें दूर करके ही पनप सकता है।केजरीवाल ये जानते हैं। उनका मोहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूल का नवीनीकरण, निजी अस्पतालों पर कार्यवाही, आम आदमी को सस्ता बिजली-पानी-दवाइयां दिलाने वाला मॉडल अनुकरणीय है। जब तक वे इस राह पर चलते रहें तब तक उनको हम सबका समर्थन मिलना चाहिए. रही बात पूंजीपतियों को राज्य सभा भेजने की तो आप कब पूंजीपति वर्ग के खिलाफ झंडा बुलंद कर के खड़ी थी? वे हमेशा से अप्रवासी भारतियों व पूँजीपतियों से चंदा लेती रही है। उसके लिए राज्य सभा की सीट बेचने की कोई ज़रूरत नहीं है। मीडिया तो इस  नीति का समर्थन करता था और कहा जाता था ये लोग उन वामपंथी विकास विरोधियों जैसे नहीं है.

क्या केजरीवाल सबको साथ लेकर चलने में नाकामयाब रहे? बिलकुल. क्या केजरीवाल संत हैं? बिलकुल नहीं! लेकिन उनका 2024 तक भारत की राजनीति में बना रहना देश के लिए ज़रूरी है। केजरीवाल आज चाँद तोड़कर भी ले आएं तो टीवी मीडिया तो कम से कम उनकी तारीफ़ नहीं ही करेगा। ये ट्विटर के बिके ट्रेंड और पोषित मीडिया उनको नहीं जिताएगा। जनता और रणनीति जिताएगी। उन्हें चुप चाप उसके लिए काम करते रहना चाहिए। मध्यम वर्ग अब और ज़्यादा दिन उनके साथ नहीं टिकेगा।

ये सारा हल्ला भी ज़्यादा दिन नहीं रहेगा. लेकिन दिल्ली की गरीब जनता और उसकी परेशानियां ज़रूर रहेंगी. केजरीवाल जब तक व्यावहारिक तरीके से उनको सुलझाते रहेंगे वे खेल में बने रहेंगे. उनका ध्यान वहीं होना चाहिए. अंत में अभिजात्य वर्ग की नैतिकता नहीं गरीब वर्ग के हित साधने से सत्ता बनती बिगड़ती है. शायद अब केजरीवाल को आम आदमी पार्टी को कुछ सुप्रसिद्ध लोगों के सोशल कैपिटल से हटाकर एक मास पार्टी बनाने के प्रयास करने चाहिए. हाँ! यदि आप केजरीवाल में मसीहा ढून्ढ रहे हैं तो आप भी जल्द निराश होंगे. क्योंकि मसीहा सिर्फ कहानियों में होते हैं.

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Published by

Anshul

PhD. Candidate, Political Science, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

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