क्या अमानवीय पेशवाई के अंत का जश्न मनाना देशद्रोह है?

bhima_koregan
Source: DailyO

महाराष्ट्र में पुणे के पास भीमा – कोरेगांव में बने स्मारक पर जाने वाले दलितों पर हमला कर दिया गया। इस हमले में एक व्यक्ति की मृत्यु और कई लोगों के चोटिल होने की खबर आयी है।

अम्बेडकरवादी संगठनों, राहुल गांधी और शरद पवार ने इस हमले के लिए कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों को दोषी ठहराया है।

दूसरी तरफ भाजपा के प्रवक्ता जी. वी. एल. नरसिम्हा राव ने कांग्रेस उपाध्यक्ष पर दलित वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाकर उनसे माफ़ी मांगने की मांग की है।

हर साल क्यों जाते हैं दलित कोरेगाँव – भीमा के स्मारक?

बयानबाज़ी से ऊपर उठकर यदि हमें इस मुद्दे की राजनीतिक अहमियत समझनी है तो हमें पूछना होगा की क्यों इतनी संख्या में देश भर से दलित इस स्मारक पर आते हैं? वह इसीलिए क्योंकि पेशवा राज के दौरान दलितों और औरतों को अमानवीय प्रथाओं और कानूनों की ज़ंजीर में जकड़ा हुआ था। जैसे दलितों को अपने गले के नीचे एक मटका बांधना पड़ता था जिससे उनकी थूक ज़मीन पर ना गिरे और कमर के पीछे एक झाड़ू लगाकर चलना पड़ता था जिससे वे जहां जाएँ उनके पदचिन्ह खुद ब खुद “साफ़” हो जाएँ। इसके अलावा सभी जाति की महिलाओं की स्थिति भी बहुत बुरी थी और वे लगातार असुरक्षा से जूझती थी।

शिक्षा व स्वास्थ के अधिकार तो छोड़िये उनके साथ इंसानों जैसा व्यवहार होना ही अकल्पनीय था। दलित समाज ने अंग्रेज़ों को पेशवाई की इस अमानवीय राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था से विद्रोह का एक ज़रिया बनाया था। याद रहे की ये बात सन 1818 की है। तब दलितों के पास आवाज़ उठाने के लिए ना संविधान था, ना अधिकार थे, ना चुनाव थे, ना ही भारतीय गणराज्य की कोई परिकल्पना थी जहां उन्हें सामान अधिकार मिलते। उनके पास दो ही विकल्प थे – या तो पेशवाई में जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीते रहो या अंग्रेज़ों से मिलकर किसी और राज में बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद करो। उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। क्या आप उन्हें इसके लिए दोष देंगे? असल में यह मराठा राज के विरुद्व अंग्रेज़ों की जीत का नहीं बल्कि पेशवा राज की हार का स्मारक है। क्योंकि उस वक़्त वे भारत के “नागरिक” नहीं पेशवाओं के ग़ुलाम थे। 

राजपूत आंदोलन में जाति नहीं दिखाई दी मीडिया को?

लेकिन अब सामाजिक न्याय की राजनीति को भी मीडिया “वोट बैंक” और विघटनकारी राजनीति बोलने लगा है।

मीडिया ने पद्मावती आंदोलन के दौरान #CasteWar #EndCastePolitics #MahaCasteWar जैसे टैग और सुर्खियां नहीं इस्तेमाल की। ऐसा लगता है मानो समाज को केवल एक दलित की मौत के बाद प्रतिरोध करता दलित समाज ही बांटता है! पद्मावती से समाज जुड़ रहा था! तब तो तलवार लेकर लोग टेलीविज़न स्टूडियो में पहुँच गए थे लेकिन इससे मीडिया को कोई दिक्कत नहीं हुई थी।

दरअसल दलितों के इस तीरथ से हिन्दू एकीकरण के समर्थक भी परेशान हो जाते हैं। उनके इतिहास में वैदिक परम्परा या सभ्यता और मुसलामानों के आने से पहले का भारत स्वर्णिम था। लेकिन जब मात्र 200 साल पूर्व महाराष्ट्र की पेशवा के शासन में दलितों के साथ इतनी बर्बरता का प्रमाण मिलता है तो हिंदुत्व के ऐतिहासिक दावे पर चोट पहुँचती है। शायद इसलिए दलितों के इस पर्व को लेकर महाराष्ट्र और देश भर में राजनीति इतनी गरमाई हुई है।

तो क्या पेशवाई के अंत का जश्न मनाना देश और समाज तोड़ने की साज़िश है? मेरा मत है की ऐसा बिलकुल नहीं है। यदि हम इस भीमा – कोरेगांव स्मारक और उसके ऊपर हुई हिंसा को इस पृष्टभूमि में देखें तब शायद हम इस पर समग्रता से एक नैतिक निष्कर्ष पर पहुंच पाएंगे। हर वो व्यक्ति जो इंसानियत को जाति व्यवस्था से ऊपर रखेगा वह कोरेगाँव की लड़ाई को याद करने वालों को राष्ट्रद्रोही या विघटनकारी नहीं बतलाएगा। 

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Published by

Anshul

PhD. Candidate, Political Science, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.

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